देहरादून: एलयूसीसी (LUCC) घोटाले की सीबीआई जांच में कई अहम खुलासे हुए हैं। जांच एजेंसी के अनुसार, कंपनी का ऐसा कोई वास्तविक व्यवसाय नहीं था जिससे उसे आय प्राप्त होती। इसके बजाय कंपनी नए निवेशकों से पैसा जुटाकर परिपक्व योजनाओं वाले पुराने निवेशकों को भुगतान करती रही।
सीबीआई के मुताबिक, इसी मॉडल के जरिए कंपनी ने करीब 800 करोड़ रुपये जुटाए, जिनमें से लगभग 400 करोड़ रुपये निवेशकों को लौटाए गए। शेष राशि को विभिन्न स्थानों पर निवेश कर कंपनी के विस्तार और साम्राज्य खड़ा करने में इस्तेमाल किया गया। मामले में अन्य वित्तीय अनियमितताओं की भी जांच जारी है।
जांच में यह भी सामने आया कि एलयूसीसी का पंजीकरण वर्ष 2012 में वाजिद खान ने सेंट्रल रजिस्ट्रार ऑफ सोसायटीज में एक मल्टी स्टेट को-ऑपरेटिव सोसायटी के रूप में कराया था। वर्ष 2016 में मुख्य आरोपी समीर अग्रवाल ने कंपनी का प्रबंधन अपने हाथ में लेकर निदेशक मंडल का गठन किया।
समीर अग्रवाल के नेतृत्व में कंपनी ने उत्तराखंड में 50 से अधिक शाखाओं के माध्यम से विभिन्न जमा योजनाएं संचालित कीं। जांच के अनुसार, वर्ष 2017 में रजिस्ट्रार ऑफ सोसायटीज, उत्तराखंड से एनओसी मिलने से पहले ही कंपनी का संचालन किया जा रहा था। सीबीआई का कहना है कि कंपनी के पास आय का कोई वैध स्रोत नहीं था, इसलिए निवेशकों से जुटाए गए धन का उपयोग ही भुगतान और संचालन के लिए किया जाता रहा।
फिलहाल सीबीआई पूरे मामले की विस्तृत जांच कर रही है और वित्तीय लेन-देन से जुड़े अन्य पहलुओं की भी पड़ताल जारी है।







