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57 साल से रामलीला की शान बने प्रह्लाद सिंह, नाल की थाप से उत्तरकाशी में जीवंत कर रहे संगीत की परंपरा

सिंचाई विभाग से सेवानिवृत्त 69 वर्षीय कलाकार आज भी संगीत के प्रति समर्पित, रामलीला में वादन के साथ नई पीढ़ी को भी दे रहे कला की सीख उत्तरकाशी।...
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विशेष संवाददाता, Uttarakhan Ekta

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13 अक्टूबर 2026, 05:16 पूर्वाह्न 1 व्यूज 3 मिनट पढ़ें
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स्थान उत्तराखंड
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रिपोर्टर Sanskriti
अपडेट किया गया 4 minutes पहले

सिंचाई विभाग से सेवानिवृत्त 69 वर्षीय कलाकार आज भी संगीत के प्रति समर्पित, रामलीला में वादन के साथ नई पीढ़ी को भी दे रहे कला की सीख

उत्तरकाशी। उत्तरकाशी के प्रह्लाद सिंह पिछले 57 वर्षों से ढोलक और नाल वादन के जरिए लोक संस्कृति और रामलीला की परंपरा को जीवंत बनाए हुए हैं। जब रामलीला के मंच पर उनकी उंगलियां नाल पर थिरकती हैं, तो संगीत की थाप दर्शकों को कथा और अभिनय से जोड़ देती है। सिंचाई विभाग से सेवानिवृत्त 69 वर्षीय प्रह्लाद सिंह का संगीत के प्रति समर्पण आज भी बरकरार है। उम्र के इस पड़ाव पर भी वह अपनी साधना जारी रखे हुए हैं और नई पीढ़ी को इस पारंपरिक कला से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।

57 वर्षों से संगीत की दुनिया से जुड़ाव

प्रह्लाद सिंह का संगीत सफर करीब 57 वर्ष पहले शुरू हुआ था। ढोलक और नाल वादन में निरंतर अभ्यास के जरिए उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। वर्षों के अनुभव ने उनके वादन को रामलीला की प्रस्तुतियों का अहम हिस्सा बना दिया है। नाल की लयबद्ध थाप से मंच पर संवादों, प्रसंगों और भावनाओं को प्रभावी बनाने में मदद मिलती है।

सेवानिवृत्ति के बाद भी नहीं थमी साधना

सिंचाई विभाग से सेवानिवृत्त होने के बाद भी प्रह्लाद सिंह ने संगीत से अपना रिश्ता नहीं तोड़ा। नौकरी से जिम्मेदारियां पूरी होने के बाद भी उनका जुड़ाव वादन और सांस्कृतिक आयोजनों से बना हुआ है। रामलीला में नाल बजाना उनके लिए केवल एक कला नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही साधना का हिस्सा है।

उनका अनुभव इस बात का उदाहरण है कि कला के प्रति लगन उम्र या पेशेवर जिम्मेदारियों तक सीमित नहीं रहती। निरंतर अभ्यास और समर्पण से कलाकार अपनी परंपरा को लंबे समय तक जीवित रख सकते हैं।

नई पीढ़ी तक पहुंचा रहे पारंपरिक कला

प्रह्लाद सिंह अपनी संगीत साधना के साथ नई पीढ़ी को भी वादन की बारीकियां सिखा रहे हैं। पारंपरिक वाद्ययंत्रों और रामलीला के संगीत को आगे बढ़ाने में ऐसे कलाकारों की भूमिका महत्वपूर्ण है। उनके अनुभव से युवा कलाकारों को लय, ताल और मंचीय प्रस्तुतियों में संगीत के महत्व को समझने का अवसर मिलता है।

लोक संस्कृति की विरासत को संजोने का प्रयास

उत्तरकाशी की सांस्कृतिक परंपराओं में रामलीला का विशेष स्थान है। इसमें अभिनय और संवादों के साथ संगीत भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्रह्लाद सिंह जैसे कलाकार अपनी कला के माध्यम से इस परंपरा को निरंतर आगे बढ़ा रहे हैं।

करीब छह दशक की संगीत यात्रा के बाद भी नाल की थाप से उनका जुड़ाव बना हुआ है। उनकी साधना न केवल व्यक्तिगत लगन की मिसाल है, बल्कि लोक संस्कृति और पारंपरिक संगीत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने के महत्व को भी रेखांकित करती है।

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